Saturday, 27 December 2025

तू क्या जीवन को कविता कर पाया?

तू क्या जीवन को कविता कर पाया?

जब भी मैं अंधे अंधेरों से लड़ी
तब मुझे कविता ने सवेरा दिया
जब भी जगमगाते सितारों को
अपना सच समझने लगी
तब कविता ने मुझे किनारा किया

कविता ने मुझे सिखाया
जीवन में अत्यधिक आदर्शवाद भी है एक माया

करुणा करके अगर तुमने करुणा को गाया
संवेदनशील होकर अगर तुमने
आम इंसान बनने को ठुकराया
अपनी असमर्थता को
न खत्म होने वाला एक रोग बनाया
तो क्या तू जीवन को कविता कर पाया?

तो क्या तू दुविधा को कला से भर पाया?
और क्या तूने कभी
राक्षस को इंसान समझकर सहलाया?
सरलता का स्वप्न ही
एक साज़िश है मानव जीवन के जीवन्तु  पर
जैसे आसानी कर्म में नहीं
तो आसानी धर्म में भी नहीं
जैसे सरलता सार में है
पर इस संसार में नहीं
वैसे ही इंसाफ़ किताब में है
पर हालात में नहीं

जैसे कि शालीनता आचार में है
पर स्वधर्म में नहीं
वैसे ही आडंबर पाखंड में है
पर दर्शन में नहीं
जैसे कि जीवन कविता में है
और कविता जीवन के हर उस मोड़ पर
जहाँ निर्दयी धर्म और कर्म में
फ़र्क़ नहीं करता

पर जब भी करता है सरहद पार कर
आधे अंधेरों से
और सिसकती आँधियों से
ग़ालिब के गीत लिए  है लड़ता
लालटेनें जलाता है विवेक की
और संदूकें खोलता है साहस के

दान करके अगर तुमने दान को गाया
और सहायता करके अगर तुमने सहायक को याद दिलाया?
तो क्या तू जीवन को कविता कर पाया?
तो क्या तू कविता को जीवन में भर पाया?                                                      


  लीज़ा

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