HIJR E MOHABBAT
हिज्र-ए-मोहब्बत हिज्र-ए-मोहब्बत का सितम इंतज़ार की आबरू से गुज़रता है, लम्हा-लम्हा सिसक-सिसक के, हर एक फ़र्द तड़पता है। हक़ का हिसाब, तेज़ाब-सा रूह के नसीब को चारदीवारी करता है, इश्क़ की आरज़ू रह जाती है बस, इश्क़ का हौसला रोज़ कई दफ़ा मरता है। फिर भी बशर हिम्मत करता, मोहब्बत करने को तैयार, मोहब्बत के अंजाम से डरता है, इश्क़ के गुलिस्तान में क़ब्र-ए-महबूब को दफ़्न करता है। हिज्र-ए-मोहब्बत, चाहत की नज़्म को नामुमकिन करता है, शख़्स को तअस्सुफ़ के तंजुम से भरता है, इंसान मिट्टी हो जाता है, बावला हुआ मुर्दा दिल लिए भटकता है। कारख़ानों से, पागलख़ानों तक, कुतुबख़ानों से, कारनामों तक, मोहब्बत वो उक़ूबत (torture) है, जिसकी उम्र भर क़ैद काटने के बाद भी, सज़ा-ए-मौत नहीं मिलती। इश्क़ वो क़ैद है, जिससे साँसें थम जाने के बाद भी, रिहाई की क़ब्र नहीं सिलती। आरज़ू वो कुआँ है,...