मौत की महफ़िल
मेरा मक़सद, तेरा ग़र्ज़ बनेगा
मेरा इरादा, तुझपे फ़र्ज़ बनेगा
तेरा जनाज़ा भी ख़ुदगर्ज़ बनेगा,
मरेगा तू, और ज़िंदा भीड़ को नीरस करेगा
किसको फ़र्क़ पड़ता है, किसी की मौत से?
इंतिक़ाल का ग़म, तो मुक़द्दर-ए-बयाँ है,
वापस ही तो जाना है, ये जहाँ तो एक ख़्वाब है
तसव्वुर-ए-कायनात है।
रह्लत का राज़ तो, इस आलम के पश्चात है,
तेरा मक़सद, तो कई इंसानी जनाज़ों के बाद है,
क्या है तेरा मक़सद, कौन है तू,
हाकिम? ग़ालिब? या शाहगिर्द?
जो भी है तू, तू ही जाने,
जो तू बन बैठा है, मलंग, दीवाने,
तू आज़ाद नहीं, तू मुसाफ़िर है, एक रिहला पर,
तू साख नहीं, तू मुहताज है, सीरत पर।
तू वाक़ई में ही कलमा है,
पर लगता तो तू राह भटका है,
पहुँच अपने गुलिस्तान,
जहाँ गुलज़ार हो तेरा नग़मा।
यहाँ तेरा कोई अपना नहीं,
ये मशऱा, झूठे और फ़रेबियों का सपना है,
सिफ़ारिशों पर चलता है, जहालत पर दौड़ाता है,
तालीम से डरता है, तौबा नहीं करता है।
ओ दीवाने, तू क्या जाने,
कैसे कट रहे हैं, कैसे काट रहे हैं,
ये बंजर धरती के बीज,
हर इंसाफ़ को, हर इंसान को, हर मिसाल को,
रिसाला चुन रहे हैं, रसूल लिख रहे हैं।
लौट जा, वरना दफ़्न हो जाएगा
फ़रेबपरस्ती के आलम में माहिर इस मशरे के ताबूतों में।
तू मारा जाएगा।
तेरा मक़सद बहुत अलग है,
तेरा कलमा, तुझपे फ़र्ज़ है,
तू ही इस जहाँ का नहीं,
तू इस तानाशाह का नहीं,
तू तनख़्वाह का नहीं,
तू ताबूतों का नहीं,
तू तालीम का है,
तू रिहाई का है,
तू जुदाई का है।
तू सब्र का नहीं,
तू सरफ़रोशी का है,
तू क़ब्र का नहीं,
तू तबाही का है।
तू पिंजरे का नहीं,
दरख़्त पर बैठी डाल का है,
तू इश्क़ का नहीं,
तू इक़बाल का है।
लीज़ा
Comments
Post a Comment