अंतःकरण — अंतिम द्वार (chapter-4)
कि जीव तो साधारण है,
ये अनुभूति ही असाधारण है।
ये सब चेतना शक्ति का चला आ रहा खेल है,
खेल है, प्रपंच है।
धन, गौरव, वैभव सब सूक्ष्म हैं,
अवलोक है, परलोक है।
परमात्मा ही परम है,
प्रधानता तो छलावा है।
जीव बस दिखावा है,
आत्मा की चाल है,
चेतना ही ढाल है।
अवचेतना भी द्वार है।
अंतःकरण एक शांत सवाल है,
जिसके परे कुछ नहीं,
कुछ नहीं उसके परे।
जो कुछ है, यही है,
और ये सब सही है।
Leeza
if you enjoy what I write you can contribute through this link - FOR INDIAN CONTRIBUTIONS
So simple. Yet so deep ❤️
ReplyDelete