सवालों की समाप्ति ( chapter-5)
खड़ा है एक द्वार।
हरि ने मुझे देखा,
अपनाया निर-अहंकार।
हरि को मैंने देखा,
तो समझ आया मुझे,
निःस्वार्थ प्रेम का सरोकार।
हर ली मेरी त्रुटियाँ,
हर लिए मेरे अवगुण।
न रहा मुझमें मैं,
न रही मुझमें ‘मैं’ (अहम्)।
अब मुझमें हरि बसे,
हरि में बस गया मैं।
विनोद, आनंद, आत्मानंद के हुई मैं पार,
परमानंद ने दिखाया मुझे
ईश्वरीय भ्रांतियों का भाव।
इंद्रियाँ मेरी बोल उठीं—
यही है, यही है।
जो बुद्ध को हुआ था,
कह दो निर्वाण या कैवल्य की धार।
ब्रह्मानंद मेरे मस्तिष्क में,
अहम् का हुआ सर्वनाश।
हरि मिले मुझे,
मुझे मिले हरि।
हार गई मैं आज,
पर हुआ जीत का एहसास।
वही था, वही है,
वही रहेगा—हर सृष्टि का सार।
नारायण, माधव, केशव, विष्णु, वासुदेव,
शंकर, शंभु, रुद्र, नीलकंठ, नटराज।
इस लोक के परे,
हर लोक के परे,
ब्रह्म पर समाप्त हो जाएँगे
अस्तित्ववाद के सारे सूक्ष्म सवाल।
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So beautifully expressed. Even though you are a non-believer, you've written it in such depth
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