फ़िज़ा ही जाने
क्यूँ है वो इतनी दीवानी?
तराशने वो झरने को जाती है,
लौटती वो रेगिस्तान से नज़र आती है।
फ़िज़ा ही जाने क्या वो गुनगुनाती है,
क्यूँ वो रोज़ाना मलंग हुई जाती है?
क्यूँ वो दरख़्त को सताती है,
क्यूँ वो जवानी में अल्हड़पन के गीत गाती है?
क्यूँ वो कहीं थम नहीं पाती है,
क्यूँ वो ठहरे से घबराती है?
रेत की नदियाँ बनाती चलती है,
उड़ाती चलती है पंछियों के पंखों के साथ।
समंदर से मुक़ाबला करने को तैयार,
करने को तैयार दोस्ती आसमान से।
चाँद की सवारी करती,
सूरज को बाँहों में भरती।
फ़िज़ा ही जाने वो क्या चाहती है?
चाहती है बहना शायद हर लम्हे,
चाहती है कहना हम सब से—
कि बहारें भी मनमौजी हैं हर उस आँगन में,
जहाँ फ़िज़ा का गुलिस्तान है हर दीवाने मन में।
जहाँ फ़िज़ा का गुलिस्तान है हर परवाने मन में…
Leeza
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