मैं कौन हूँ की समाप्ति
मैं कौन हूँ की समाप्ति
मैं कौन हूँ के सवालों ने अक्सर मुझे मार डाला।
कुछ इस तरह कि इन सवालों ने मेरी गर्दन मरोड़कर
उसे मेरे सिर से अलग कर दिया,
और फिर मेरी समूची चेतना में झाँकना चाहा।
हम अक्सर जानना तो चाहते हैं कि हम कौन हैं,
पर जान नहीं पाते।
पर हम में से कई को जब ये मालूम चल जाता है कि
वो हकीकत में कौन है,
तो वो, वो रहना नहीं चाहते।
ज़्यादातर जीवन इन सवालों के इर्द-गिर्द मंडराता है कि मेरा अस्तित्व आखिर है क्या,
और जब इसकी अनुभूति होती है,
तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
बचा हुआ जीवन फिर ये जानकर कि मैं क्या हूँ,
वहाँ से भागने में व्यर्थ कर दिया जाता है,
क्योंकि वो जो आप हो, वो बनना शर्मिंदा करता है।
कैसे बनें लेखक, गायक या कलाकार?
जब दुनिया मिस्त्री बनाने में लगी है?
कैसे बने इंसान,
जब दुनिया शैतानों से सजी है?
कैसे बने दोस्त,
जब दुनिया दुश्मनों से भरी पड़ी है?
कैसे बने हमदर्द,
जब दुनिया ग़म बढ़ाने में लगी है?
कैसे बने शुभचिंतक,
जब दुनिया नज़र लगाने में लगी है?
पर दुनिया का क्या है?
ये कब किसकी सगी है?
जब जान जाओ कि आखिर कौन हो,
तो वो बनकर दिखाओ जो असल में हो।
रोज़ाना, हर लम्हा, हर इतवार, हर त्योहार…
तो सोचकर बनाना।
ये दुनिया मज़दूर बनाकर छोड़ेगी,
थोड़े से कलाकार तुम ख़ुद बन जाना।
ये दुनिया, जीते-जी दफ़न कर छोड़ेगी,
थोड़ा सा जीवन तुम अपने लिए रोज़ाना ज़रूर बचाना…
कौन हो के सवालों में उलझकर मत रह जाना,
इसका सही जवाब जीकर ही जाना जा सकता है।
जीवन को कल पर डालकर नहीं,
जीवन को संभालकर नहीं…
जब जान जाओगे कि कौन हो,
तो मुश्किल हो जाएगा और जीवन।
जीवन से हट जाएगा अँधेरा,
सवेरा हाथ बढ़ाएगा।
जीवन को जीकर जब तुम देखोगे,
तो जीवन तुम्हें समझ आएगा,
और जीवन तुम्हें कुछ अपनी समझाएगा।
मैं कौन हूँ से
मैं कैसे वो रहूँ जो मैं असल में हूँ
तक का सफ़र जब तय हो जाएगा,
तो जाने-अनजाने,
जीवन मानसिक सतह बन जाएगा।
जीवन निर्भय हो जाएगा,
जीवन परिचय हो जाएगा,
जीवन एक विनम्र संचय हो जाएगा।
धरातल अंबर हो जाएगा,
मिस्त्री स्वामी हो जाएगा।
जीवन एक सफ़र हो जाएगा,
इंसान एक मंज़र हो जाएगा।
अस्तित्ववाद के सवालों का अंजाम
वो बनकर ख़त्म हो जाएगा,
जो इंसान हमेशा से था,
जो इंसान हमेशा रहेगा,
जो इंसान में हमेशा रहेगा।
इंसान एक चेतना शिविर हो जाएगा,
इंसान बस एक शक्ल हो जाएगा,
और उसी दिन इंसान सफल हो जाएगा।
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