निर्वाण — जीवित मानव का मृत्युलेख (Chapter 3)

NIRVANA - THE OBITUARY OF LIVING HUMAN

1) अगर इस संसार के परे कुछ और नहीं है, तो इस संसार में मुझे चैन क्यों नहीं आता?

2 ) मेरी कोशिकाएँ मुझसे रोज़ाना कहती हैं, मैं सपना जी रही हूँ, हक़ीक़त इस ब्रह्मांड के पार है।

3 ) ईश्वर और मेरे अहम् का फ़ासला तभी समाप्त हो जाता है, 
जब मन, बुद्धि, चेतना का आलिंगन ईश्वरीय चेतना के आगे सूक्ष्म पड़ जाता है।

4) मैं समय के उस छोर पर खड़ी हूँ,
 जहाँ समय थम जाता है, 
और मैं सृष्टि में सम्मिलित हो जाती हूँ।

5 ) यह जगत मेरा नहीं, न मैं जगत की।
 मैं जगदीश की हूँ, मैं जगदीश ही हुई।

6) इश्क़ समाधि है, 
समाधि सपना है, 
सपना ही यथार्थ है,
और यथार्थ चेतना है।


7) प्रभु मुझमें, मैं प्रभु में। 
प्रभु न पाखंड में, प्रभु तो बस प्रार्थना में।
 प्रभु न स्वार्थ में, प्रभु तो बस त्याग में। 
प्रभु न करने में, प्रभु तो बस ठहरने में। 
देखो कभी ठहर कर, 
समय का पहिया टूट जाएगा, 
वक़्त नज़र नहीं आएगा।
 निर्वाण एक विचार नहीं, निर्वाण ही द्वार है—आंतरिक, अंतर्दृष्टि का। 
कि प्रभु कोई मंज़िल नहीं, प्रभु तो मुक्ति है; मुक्ति स्वयं से, मुक्ति अहम् से।

Leeza 
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Comments

  1. This is not just poetry, it's a spiritual experience.

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