Monday, 26 January 2026

THE JOKE OF JANUARY

1) My pens are not my swords anymore because I don't do violence I only do sense.

2) All my life I wanted to become something and in that process I never lost myself, sticking to my shade of red, agnostic and kind.

3) I know I grew out, parts of me to become who I am, but that 3 rd grade kid was the same as of me now  - unbothered, determined and insane.


4) January , please stop boiling my blood in different shades of red .

5) I am the wisest fool I have ever met, who has unwavering faith in education and no faith in unconditional love, except when it comes to my mother.

6) Exceptions exist only in the form of my mother for me always and forever.

Leeza

DEATH OF FATE

1) It has nothing to do with my fate. It has nothing to do with my rage. It has nothing to do with what I have endured but it's always what I did at the end in the form of action . Always

2) I stopped imagining the ghosts inside my bed and I chose to became one, instead.
 

3) If you think I ever cared , trust me I did once.
But if you think I do now , then you would always see it in my actions.
I always act, I always did.

4) The satan told me last night,
It was always me and my books.

5) Let me burn every piece of mediocrity I bring to the table , though I never did.

6) I envy the ignorant in a disgusting way and I choose to read more, to not become like one.

Leeza 

Monday, 5 January 2026

जंग का मैदान

जंग का मैदान


कह गए बड़े बुज़ुर्ग,
ये जीवन एक खेल है,
मुहाफ़िज़ कई सारे रखो जन्नत ले जाने को,
और हारीफ़ कई दर्ज़न रखो,
जहन्नम में सजाने को।

आपसी रंजिशों में,
मुद्दतें गुज़ार दो,
सितम में जब ग़म बढ़े,
तब इंसान पर इंसान की लाश वार दो।

जंग के मैदान में,
बहन-भावजों को जो तूने क़ुर्बान किया,
किसका मुहाफ़िज़ तू अब बन पाया?
दुश्मन-ए-दीन तू है अब कहलाया?

लहू की चादरों में,
हड्डियों के ढाँचों को कंकाल किया,
क़ब्र पर जो गुलाब वार किए,
उसके काँटे उन्हीं की क़ब्र पर टाँक दिए।

क़ब्र पर जो औज़ार, हथियार किए,
उनको तूने है दफ़नाया?
किसका मुहाफ़िज़ तू बन पाया?
किसको तूने है अपनाया?

शिकस्त दी, शिकस्त दी—
दुश्मन-ए-जान को शिकस्ती दी,
ग़द्दारों को दिया आसरा,
बड़े बुज़ुर्ग कह गए सही,
इंसान किसी का मुहाफ़िज़ न बन पाया,
इंसान, इंसान को महफ़ूज़ न रख पाया।
विश्व-कलह हो या त्रासदी,
दुश्मनी है इंसानों की इंसानियत से ज़्यादती,
चोट है गिरेबान में,
इंसान है शैतान में।

इंसान है इस गुमान में,
एक बहुत बड़े इम्तिहान में,
जंग के मैदान में—
हिंदुस्तान में या पाकिस्तान में।

विश्व युद्ध की कगार में।
बड़े बुज़ुर्ग कह गए सही,
इंसान से बड़ा लाचार कोई नहीं,
इंसान से बड़ा ग़द्दार कोई नहीं।

सौ दलीलों में क़ैद है,
सही करने से डरता,
ग़लत करने को मुस्तैद है।

इंसान की आपसी बैर में,
क़ैद-सा सियार है,
हिरन के शिकार में,
शेर बनाने को तैयार है।

क़ब्र पर क़ब्र वार किए,
न जाने युद्ध में कितने नरसंहार किए,
धरती को कंकाल किया,
अब यूँ श्मशान को भी सुनसान किया।

क्यों बिलख रहा,
क्यों आँसू बहाता है तू?
जब कोई नहीं तुझे शिकस्त देने को,
क्यों नहीं मुस्कुराता है तू?

धरती बंजर है,
भरा पड़ा है क़ब्रिस्तान,
न बारिश होती है यहाँ,
बस फटता है आसमान।

जी ले ऐसी धरती पर,
तन्हा तू ही है इंसान,
क्यों मरने को कारगर है तू,
अब कहाँ गया तेरा जज़्बा-ए-जहाँ? 

जंग के मैदान में,
अब कोई नहीं है तेरा नुमाइंदा,
हिंदुस्तान हो या हो पाकिस्तान।
मुद्दतों तक न होगा
ऐसी धरती का पुनर्निर्माण।

इंसान ने इंसानियत पर
न जाने कितने आघात किए,
बड़े बुज़ुर्ग कह गए—
दुश्मनी से न घर बसे,
दुश्मनी से न जाने
कितने मुल्क ढह गए।

क़ौमों की त्रासदी हुई,
विध्वंस हुआ संसार,
तख़्त पलटे, सत्ताएँ बदलीं,
पर इंसान ने न सही सबक़ याद किए।

रोज़े रखे, ख़ैरात दी,
पैग़म्बर को भले ही याद किया,
हर वक़्त सलाम किया,
दुआ माँगी, अच्छा काम किया।
पर न नेक इरादा रखा,
और कर्मों को क़ायदे से साफ़ किया।

किया तो धर्म के नाम पर,
हर काम को हराम किया,
मज़हब को बदनाम किया,
शरीअत का ग़लत इस्तेमाल किया।

हदीथो की ग़लत तशरीह बाँधी,
गीता से भी न इंसाफ़ किया,
“जिहाद” जिहाद” चिल्लाकर,
न जाने कितने मासूमों को गुमराह किया।

जन्नत के फ़लसफ़े सुनIकर
धरती को जहन्नुमात किया।

Leeza

Sunday, 4 January 2026

NAZAM-E- NAFRAT

1) सील दूँ मैं होंठों को और काम ले लूँ
अपने मस्तिष्क से मैं सारे,
जनाज़े भी उठ खड़े होंगे क़ब्र से
अगर नाम ले लूँ मैं
तशद्दुद तेरे सारे।

2) आईने को आग दे दूँ
और लफ़्ज़ों को राख दे दूँ मैं उध।र,
करतब जो मैं अपनी क़ाबिलियत का लगा लूँ
तो लहू-लुहान हो जाए
क़यामत के सारे वार।


3) सरफ़रोशी की आरज़ू न कर तू साईं,
मेरे साथ देने का अंदाज़ ही क़ातिलाना है।
आग़ाज़ कर तू अंदाज़-ए-बयाँ न कर,
जो अंजाम हो गया तो क़ायनात हासिल,
जो न हुआ तो ख़ुदा।

4) इश्क़ बर्दाश्त नहीं मुझे अब,
कर सकते हो तो क़ायदे से नफ़रत करो।
जन्नत रास नहीं मुझे अब,
अगर हौसला है तो जहन्नम में मेरी हसरत करो।

मौत तो आनी है,
जीते-जी मरने की तमन्ना कम करो।
मुक़ाबला अगर बर्बादी का हो,
तो मुक़ाबला मुकम्मल करो।

Leeza 

Saturday, 3 January 2026

HARFE-NAMA

1) या तो ये किताबें मुझे निगल लें या

 मैं इन किताबों को निगल जाऊँ

अगर ये मुझे निगलें तो मैं इनका आख़िरी हरफ़ बन जाऊँ
और मैं इन्हें निगलूँ तो मैं इन्हें अपना हलफ़नामा बनाऊँ l


2) मेरे अंदर एक उदास ज़माना मुंतक़िल है, 
शायर की रूह में एक दीवाना मुंतक़िल है
मोहब्बत से भागता एक ज़हीन स्याना मुंतक़िल है
पर नफ़रत करने में नाकाम एक अफ़साना मुंतक़िल है l

3) रात गुज़र गई मगर सवेरा नहीं हुआ,

मेरा अक्स-अक्स उसके लिए मिटने को तैयार था,

पर वो मेरा नहीं हुआ।

4) मेरे जीवन में कविताओं ने अक्सर मेरे लिए वो काम किया है,
जो इंसान करने में नाकाम रह गए।

लीज़ा शर्मा

Thursday, 1 January 2026

Tarz-e-Amal

बादशाह भी ख़ुदा के सामने झुके
और मज़लूम भी झुके गुनहगार के आगे,
कलाकार भी कला के आगे झुके,
इंक़लाबी भी झुके इंक़लाब के आगे।

बच्चा भी बुज़ुर्ग के आगे झुके,
शेर भी झुके नज़्म के आगे,
माशूक़ भी महबूबा के आगे झुके,
जैसे इंसान झुके क़ायदे के आगे।

दीवाना भी रब के आगे झुके,
जहाज़ भी झुके बवंडर के आगे,
लाश भी क़ब्र के आगे झुके,
बाग़ी न झुके क़ायनात के आगे।

Leeza

OH GOD, LOVE SO GOOD, THAT I NEVER WANNA BE IN LOVE FOR LIFE! ( song)

I tried to get morphed into your world and then I fell into your disguise I got blinded by that tall side, don't pity me, I got the kar...