HARFE-NAMA
1) या तो ये किताबें मुझे निगल लें या
मैं इन किताबों को निगल जाऊँ
अगर ये मुझे निगलें तो मैं इनका आख़िरी हरफ़ बन जाऊँ
और मैं इन्हें निगलूँ तो मैं इन्हें अपना हलफ़नामा बनाऊँ l
2) मेरे अंदर एक उदास ज़माना मुंतक़िल है,
शायर की रूह में एक दीवाना मुंतक़िल है
मोहब्बत से भागता एक ज़हीन स्याना मुंतक़िल है
पर नफ़रत करने में नाकाम एक अफ़साना मुंतक़िल है l
3) रात गुज़र गई मगर सवेरा नहीं हुआ,
मेरा अक्स-अक्स उसके लिए मिटने को तैयार था,
पर वो मेरा नहीं हुआ।
4) मेरे जीवन में कविताओं ने अक्सर मेरे लिए वो काम किया है,
जो इंसान करने में नाकाम रह गए।
लीज़ा शर्मा
Fabulous
ReplyDeleteSupper sein bhi upper
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