जंग का मैदान

जंग का मैदान


कह गए बड़े बुज़ुर्ग,
ये जीवन एक खेल है,
मुहाफ़िज़ कई सारे रखो जन्नत ले जाने को,
और हारीफ़ कई दर्ज़न रखो,
जहन्नम में सजाने को।

आपसी रंजिशों में,
मुद्दतें गुज़ार दो,
सितम में जब ग़म बढ़े,
तब इंसान पर इंसान की लाश वार दो।

जंग के मैदान में,
बहन-भावजों को जो तूने क़ुर्बान किया,
किसका मुहाफ़िज़ तू अब बन पाया?
दुश्मन-ए-दीन तू है अब कहलाया?

लहू की चादरों में,
हड्डियों के ढाँचों को कंकाल किया,
क़ब्र पर जो गुलाब वार किए,
उसके काँटे उन्हीं की क़ब्र पर टाँक दिए।

क़ब्र पर जो औज़ार, हथियार किए,
उनको तूने है दफ़नाया?
किसका मुहाफ़िज़ तू बन पाया?
किसको तूने है अपनाया?

शिकस्त दी, शिकस्त दी—
दुश्मन-ए-जान को शिकस्ती दी,
ग़द्दारों को दिया आसरा,
बड़े बुज़ुर्ग कह गए सही,
इंसान किसी का मुहाफ़िज़ न बन पाया,
इंसान, इंसान को महफ़ूज़ न रख पाया।
विश्व-कलह हो या त्रासदी,
दुश्मनी है इंसानों की इंसानियत से ज़्यादती,
चोट है गिरेबान में,
इंसान है शैतान में।

इंसान है इस गुमान में,
एक बहुत बड़े इम्तिहान में,
जंग के मैदान में—
हिंदुस्तान में या पाकिस्तान में।

विश्व युद्ध की कगार में।
बड़े बुज़ुर्ग कह गए सही,
इंसान से बड़ा लाचार कोई नहीं,
इंसान से बड़ा ग़द्दार कोई नहीं।

सौ दलीलों में क़ैद है,
सही करने से डरता,
ग़लत करने को मुस्तैद है।

इंसान की आपसी बैर में,
क़ैद-सा सियार है,
हिरन के शिकार में,
शेर बनाने को तैयार है।

क़ब्र पर क़ब्र वार किए,
न जाने युद्ध में कितने नरसंहार किए,
धरती को कंकाल किया,
अब यूँ श्मशान को भी सुनसान किया।

क्यों बिलख रहा,
क्यों आँसू बहाता है तू?
जब कोई नहीं तुझे शिकस्त देने को,
क्यों नहीं मुस्कुराता है तू?

धरती बंजर है,
भरा पड़ा है क़ब्रिस्तान,
न बारिश होती है यहाँ,
बस फटता है आसमान।

जी ले ऐसी धरती पर,
तन्हा तू ही है इंसान,
क्यों मरने को कारगर है तू,
अब कहाँ गया तेरा जज़्बा-ए-जहाँ? 

जंग के मैदान में,
अब कोई नहीं है तेरा नुमाइंदा,
हिंदुस्तान हो या हो पाकिस्तान।
मुद्दतों तक न होगा
ऐसी धरती का पुनर्निर्माण।

इंसान ने इंसानियत पर
न जाने कितने आघात किए,
बड़े बुज़ुर्ग कह गए—
दुश्मनी से न घर बसे,
दुश्मनी से न जाने
कितने मुल्क ढह गए।

क़ौमों की त्रासदी हुई,
विध्वंस हुआ संसार,
तख़्त पलटे, सत्ताएँ बदलीं,
पर इंसान ने न सही सबक़ याद किए।

रोज़े रखे, ख़ैरात दी,
पैग़म्बर को भले ही याद किया,
हर वक़्त सलाम किया,
दुआ माँगी, अच्छा काम किया।
पर न नेक इरादा रखा,
और कर्मों को क़ायदे से साफ़ किया।

किया तो धर्म के नाम पर,
हर काम को हराम किया,
मज़हब को बदनाम किया,
शरीअत का ग़लत इस्तेमाल किया।

हदीथो की ग़लत तशरीह बाँधी,
गीता से भी न इंसाफ़ किया,
“जिहाद” जिहाद” चिल्लाकर,
न जाने कितने मासूमों को गुमराह किया।

जन्नत के फ़लसफ़े सुनIकर
धरती को जहन्नुमात किया।

Leeza

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