मैं एक विचार हूँ

मैं एक विचार हूँ                                                                                                                                                                                                                                                                   
विचारधाराओं से आसक्त,
गलत-सही की राजनीति से परे,
हर आँगन में जन्मा,
एक शिशु-सा पनपा,
मैं एक विचार हूँ।

मैं हर सदी में जन्मा हूँ,
नौजवानों के मन में,
प्रगतिशील चेतना के अवचेतन में,
जिसने मुझे दबाया, उसक। अंत
निकट है आया।

समाज ने मुझे
विचारधाराओं, धर्मों और ताबूतों में कैद करना चाहा,
पर मैं हुआ फरार, मैं कभी किसी के हाथ न आए,
मैं विचार हूँ,
मैंने हर सत्तावादी के मन में डर है सुलगाया।
मैं जब किसी के अंतरमन में बसता हूँ,
तो वह कभी कैद नहीं हो पाया।
सही प्रश्नों और सही मूल्यों को है उसने अपनाया।
जो मुझे अपनाना भूल गए,
उन्होंने अपने मस्तिष्क को कालकोठरी है बनाया।

मैं हिंसा की विचारधारा नहीं,
मैं प्रतिगामीवाद का पिटारा नहीं,
मैं कलंक नहीं उग्रवाद का,
मैं नारा नहीं कौमपरस्ती का।
मैं सेवा का सौभाग्य हूँ,
मैं देशाहंकार का फ़लसफ़ा नहीं पढ़ता,
मैं स्वेच्छा को सादर नमन करता हूँ,
मैं तानाशाह की गोलियों से नहीं घबराता।


संसार कहता है, संसार पूछने पर अड़ा रहता है
कि क्या मैं मार्क्सवादी हूँ या मैं पूँजीवादी हूँ?
पर मैं डटा रहता हूँ यह कहने में,
कि मैं मानववादी हूँ,
मैं पशुवादी हूँ,
मैं पर्यावरणवादी हूँ।
मैं सहनशील भी,
मैं आभारी हुई,
मैं समझौते से नहीं डरता,
पर मैं आज़ादी का समझौता नहीं करता।


मत डालो मुझे कटघरे में,
मत पूछो मुझसे
कि मैं किस नेता का समर्थक हूँ,
किस राजनीतिक दल से मेरा नाता है,
क्योंकि मुझे नहीं आता
विचारधाराओं में बंधकर जीना।
मुझे आता है बस
प्रगतिशीलता से अपने विचारों को कहना।
मैं नदी हूँ, मैं समंदर में मिलने नहीं बना।
मैं तारा हूँ, मैं चाँद की चमक से आकर्षित नहीं।
मैं शिक्षा हूँ, मैं भाषाओं की प्रधानता में भेद नहीं रखता।
मैं स्वास्थ्य हूँ, पर मैं परीक्षण से नहीं डरता।


मैं विचार हूँ,
मैं विचारधाराओं से ग्रसित नहीं होता।
मैं अनुसंधान हूँ,
मैं अनुभवों और प्रयोगों के साथ हूँ चलता।
मैं विचार हूँ,
मैं गांधी और अंबेडकर में फ़र्क नहीं करता।
मैं विचारधारा नहीं,
मैं एक खूंटे से बँधकर आगे नहीं बढ़ता।


मैं कार्यरत हूँ बदलाव के,
मैं कार्यरत हूँ संवाद के,
मैं कार्यरत हूँ संवेदना के,
मैं कार्यरत नहीं, बस उत्तेजना के।
मैं सिंधु घाटी से मुगलों तक आया,
मैं मेसोपोटामिया से मिस्र तक लाया गया।
मैं हिंदू से मुसलमानों के बीच बैठता हूँ।
मैं तर्क करता हूँ, तानाशाह की तरह गुरूर नहीं करता।


मैंने कई हिटलर देखे, पर मैं डगमगाया नहीं।
कई स्टालिन देखे, पर मैंने सिर झुकाया नहीं।
मैंने कई औरंगज़ेब देखे, पर मैं घबराया नहीं।
मैंने 1975 के आपातकाल को देखा, पर मैं सकपकाया नहीं।


2026 में मैंने जो देख रहा हूँ,
उसने मुझे हैरान ज़रूर किया है,
पर मैं तो यह सब सदियों से देखता आया हूँ,
हालाँकि हिंदुस्तान में कभी इस बर्बरता से नहीं,
पर मुझे भय नहीं, मुझे विश्वास है,
हर युग की युगचेतना, युवा के ही तो हाथ है,
तो क्रांति तो बड़ी आम बात है, और अंत भी निकट है,
बस कब होगा यही अब देखने वाली बात है।

मैं विचार ही था, एक बीज-सा।
जब पेड़ बना, तो लोगों ने बहुत दबाया।
पूछा, “तुम किस जंगल के हो?”
मैंने कहा, मैं किसी जंगल का कब कहा था?
मैं तो खुद में ही जंगल था।
मुझे क्यों ज़रूरी है किसी में मिलना,
जब मेरे पास सोचने की आज़ादी है?
देखने का नज़रिया है
और टहलने का जज़्बा है।


मैं क्यों किसी और के नज़रिए से देखूँ संसार को?
यह पहचान की आपदा क्या मुझ पर इतनी भारी है?
क्यों बँध जाऊँ मैं, एक डब्बे भर के विचारों से?
क्या व्यक्ति-विशेष की पूजा करना ही मेरी एकमात्र ज़िम्मेदारी है?
हाँ, पसंद है मुझे परसाई,
पर मैं सिल्विया प्लाथ को भी पढ़ता हूँ।

हाँ, पसंद है मुझे प्रेमचंद,
पर मैं फ़्रांज़ काफ्का से भी इत्तेफ़ाक़ रखता हूँ।
शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय, अधिकारों की तो बात करता हूँ।
जवाबदेही चाहता हूँ, कुछ चंद सवाल ही तो करता हूँ।

असहमति होने पर गुंडागर्दी तो नहीं करता।
मतभेद हम सबमें हैं,
पर मैं आपके देशप्रेम पर संदेह तो नहीं करता?
क्यों हूँ मैं राष्ट्रविरोधी?
क्यों नहीं हो सकता मैं राष्ट्रहित में?
मैं एक विचार ही तो हूँ।
मैं हरगिज़ एक विचारधारा नहीं हो सकता।
मैं पद्धति नहीं बनना चाहता।
आज़ाद ख़याल रहता हूँ, भाप-सा बहता हुआ,
मैं कैद नहीं होना चाहता।
मैं हर स्वतंत्र मन के कोने में घर करना चाहता हूँ।


मैं पहाड़ नहीं होना चाहता,
मैं झरने-सा बहना चाहता हूँ।
मैं सोचने की समझ में विश्वास करता हूँ।
मैं विचार ही तो हूँ,
बस विचारों का सरोकार लेना चाहता हूँ।
नहीं मानता मैं तुम्हारे नियमों के ढाँचों को।

नहीं मानता मैं तुम्हारी क्रूर विचारधाराओं को।
मानता हूँ तो बस समय के साथ चलने में, बदलने में,
परिवर्तन के पथ पर, समझ के साथ संभलने में।
अठारहवीं शताब्दी के ख़यालों को मैं इक्कीसवीं सदी में नहीं लाता।
जो रूढ़िवादी था, मैं उसके नारे नहीं लगाता।
नई पीढ़ी को पुरानी से कमतर नहीं बतलाता।
तब्दीली के आलिंगन में,
मैं तब्दील हुआ जाता हूँ।

मैं विचार ही तो हूँ,
बस कुछ सवालों के जवाब ही तो चाहता हूँ।
मैं विचार ही तो हूँ,
तुम सबको मैं बस विचारधाराओं में ही क्यों नज़र आता हूँ?


— लीज़ा

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