NAZAM-E- NAFRAT
1) सील दूँ मैं होंठों को और काम ले लूँ
अपने मस्तिष्क से मैं सारे,
जनाज़े भी उठ खड़े होंगे क़ब्र से
अगर नाम ले लूँ मैं
तशद्दुद तेरे सारे।
2) आईने को आग दे दूँ
और लफ़्ज़ों को राख दे दूँ मैं उध।र,
करतब जो मैं अपनी क़ाबिलियत का लगा लूँ
तो लहू-लुहान हो जाए
क़यामत के सारे वार।
3) सरफ़रोशी की आरज़ू न कर तू साईं,
मेरे साथ देने का अंदाज़ ही क़ातिलाना है।
आग़ाज़ कर तू अंदाज़-ए-बयाँ न कर,
जो अंजाम हो गया तो क़ायनात हासिल,
जो न हुआ तो ख़ुदा।
4) इश्क़ बर्दाश्त नहीं मुझे अब,
कर सकते हो तो क़ायदे से नफ़रत करो।
जन्नत रास नहीं मुझे अब,
अगर हौसला है तो जहन्नम में मेरी हसरत करो।
मौत तो आनी है,
जीते-जी मरने की तमन्ना कम करो।
मुक़ाबला अगर बर्बादी का हो,
तो मुक़ाबला मुकम्मल करो।
अपने मस्तिष्क से मैं सारे,
जनाज़े भी उठ खड़े होंगे क़ब्र से
अगर नाम ले लूँ मैं
तशद्दुद तेरे सारे।
2) आईने को आग दे दूँ
और लफ़्ज़ों को राख दे दूँ मैं उध।र,
करतब जो मैं अपनी क़ाबिलियत का लगा लूँ
तो लहू-लुहान हो जाए
क़यामत के सारे वार।
3) सरफ़रोशी की आरज़ू न कर तू साईं,
मेरे साथ देने का अंदाज़ ही क़ातिलाना है।
आग़ाज़ कर तू अंदाज़-ए-बयाँ न कर,
जो अंजाम हो गया तो क़ायनात हासिल,
जो न हुआ तो ख़ुदा।
4) इश्क़ बर्दाश्त नहीं मुझे अब,
कर सकते हो तो क़ायदे से नफ़रत करो।
जन्नत रास नहीं मुझे अब,
अगर हौसला है तो जहन्नम में मेरी हसरत करो।
मौत तो आनी है,
जीते-जी मरने की तमन्ना कम करो।
मुक़ाबला अगर बर्बादी का हो,
तो मुक़ाबला मुकम्मल करो।
Leeza Sharma
Khubsurat
ReplyDelete