HIJR E MOHABBAT
हिज्र-ए-मोहब्बत
हिज्र-ए-मोहब्बत का सितम
इंतज़ार की आबरू से गुज़रता है,
लम्हा-लम्हा सिसक-सिसक के,
हर एक फ़र्द तड़पता है।
हक़ का हिसाब,
तेज़ाब-सा रूह के नसीब को चारदीवारी करता है,
इश्क़ की आरज़ू रह जाती है बस,
इश्क़ का हौसला रोज़ कई दफ़ा मरता है।
फिर भी बशर हिम्मत करता,
मोहब्बत करने को तैयार,
मोहब्बत के अंजाम से डरता है,
इश्क़ के गुलिस्तान में क़ब्र-ए-महबूब को दफ़्न करता है।
हिज्र-ए-मोहब्बत, चाहत की नज़्म को नामुमकिन करता है,
शख़्स को तअस्सुफ़ के तंजुम से भरता है,
इंसान मिट्टी हो जाता है,
बावला हुआ मुर्दा दिल लिए भटकता है।
कारख़ानों से, पागलख़ानों तक,
कुतुबख़ानों से, कारनामों तक,
मोहब्बत वो उक़ूबत (torture) है,
जिसकी उम्र भर क़ैद काटने के बाद भी, सज़ा-ए-मौत नहीं मिलती।
इश्क़ वो क़ैद है,
जिससे साँसें थम जाने के बाद भी,
रिहाई की क़ब्र नहीं सिलती।
आरज़ू वो कुआँ है,
जिसमें गिरने के बाद भी,
प्यास नहीं बुझती।
ख़्वाहिश वो बारिश है,
जिसमें भीगने के बाद भी,
ग़ज़ालत नहीं धुलती।
याद-ए-माज़ी वो दरख़्त है जिसे काट,
फेंकने के बाद भी,
उसकी जड़-ए-निशानी नहीं मिटती l
एक तरंग-सी उठती है जिस्म के एक कोने में, एक अफ़्सुर्दगी बस जाती है,
जज़्बात की लहरों को, उम्र भर ढोने में।
आँख लगती है, ख़्वाब में महबूब नज़र आता है,
आँख खुलती है, हक़ीक़त में हlरीफ़ से मुक़ाबला हो जाता है।
इंसान बावला हो जाता है,
जीते-जी मरने को उतावला हो जाता है,
चाहतों पर गज़ भर के ताले लगाए,
उसकी चाबी का ही तबादला हो जाता है।
हिज्र-ए-मोहब्बत का हिसाब,
हराम-ए-हयात में तय होता है।
ख़ुदा का क़ाफ़िला, बेख़ुदी का सौदा है।
चाहत की कुर्सी पर हर आवारा सोता है,
दयारों का बिस्तर हर किसी को थोड़ी नसीब होता है?
हिज्र-ए-मोहब्बत, एक इम्तिहान है,
गुमनाम मोहब्बत को लाश बनते देखने का,
और इत्मीनान से उसके जनाज़े को जहाज़ बनते देखने का,
ज़िंदगी को हस्सास बनते देखने का।
हिज्र-ए-मोहब्बत, एक अंजाम है,
इश्क़ को इस सदी में आम बनते देखने का।
हिज्र-ए-मोहब्बत, एक बनाम है,
तक़दीर और इख़्तियार के मुक़ाबले में, तक़दीर को इंतिक़ाम बनते देखने का।
हिज्र-ए-मोहब्बत, वज़ीफ़ा है वफ़ा का,
दर्द-ए-रूह, ख़ुद पर उम्र भर फ़र्ज़ की हुई सज़ा का।
महबूब को नमाज़ बनते देखने का,
और मजनूँ को मुर्दा लाश बनते देखने का।
लाशों की चादरें बिछी हैं,
हिज्र के ग़म की ताबूत-सज़ी है।
क़लंदर, कमली, कसाब, सब क़ायदा हुए जा रहे हैं,
क़ैद से जो भागा, वो अब क़िस्मत का दायरा हुए जा रहे हैं।
जा रहे हैं महबूब समंदर की ओर,
जा रहे हैं आशिक़ बवंडर की ओर,
जा रहे हैं दीवाने अब दफ़्तर की ओर,
जा रहे हैं परवाने, वापसी हिज्र-ए-मोहब्बत की ओर।
— लीज़ा
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