आज़ादी को अंबर मत कर तू

आज़ादी को अंबर मत कर तू
तुझे आज़ादी से इश्क़ कहाँ,
तुझे तो क़ैद की आदत थी,
पर जब तू आज़ाद हुआ,
तू तो आज़ादी से ही रूठ गया।

ये आदत तुझे मार ही न डाले,
कहीं पिंजरे को तू अपना घर ही ना बना ले।
मृत्यु से पहले, क़ब्र को घर मत कर तू,
मौत से पहले, पिंजरे को अंबर मत कर तू।

आज़ादी को रिहाई न समझ तू,
ये तो सवालों का मक़बरा है।
आज़ादी को हिज्र न समझ तू,
ये तो मुक्ति का फ़लसफ़ा है।
आज़ादी को इश्क़ न समझ तू,
ये तो मोहब्बत का क़ाफ़िला है।
आज़ादी को अंबर मत कर तू,
ये तो तेरे अस्तित्व का आईना है।

आज़ाद होने पर तू अनाथ नहीं,
अनाथ होने पर तू आज़ाद नहीं।

कायनातों के बदल जाने से हालात नहीं बदला करते,
हालातों के बदल जाने से जज़्बात नहीं बदला करते।
आँख मींच लेने से, सवालात नहीं बदला करते,
दुल्हन के मर जाने से, बारात नहीं बदला करते।

माना तेरी दुल्हन आज़ादी है,
तो क्या मेरा दूल्हा, क़ैद बनेगा?
माना ज़िंदगी तुझ पर अभी कुछ भारी है,
तो क्या मरने से, कफ़न दुल्हन का लाल जोड़ा लगेगा?

माना आज़ादी थोड़ी भारी है,
तो क्या भाग जाना ही तुझे आज़ाद करेगा?
माना क़ैद की फ़ितरत की तू मारी है,
तो क्या क़ैद ही तेरी तक़दीर बनेगा?

कब तक भागेगा तू बिगड़ने से?
बिगड़कर सँवरने का अवसर ही तो तुझे आज़ाद करेगा।
माना आज़ादी की, की तूने तैयारी है,
पर तैयारी की सवारी का कब तक तुझे इंतज़ार रहेगा ?

माना क़ैद की लगी तुझे बीमारी है,
पर ये बंधन ही तुझे एक दिन आज़ाद करेगा  l

या तो तू ज़िंदा रहेगा, या तेरा सिर कटेगा,
जो भी हो, मौत भी हुई,
तब भी तू आज़ाद रहेगा।

Leeza 

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