लोकतंत्र की आत्मा(In context of jantar mantar protest)
जब-जब लोकतंत्र की आत्मा नोची जाती है, तब-तब उसकी चेतना
कब्रों में से उठ खड़ी हो जाती है।
ये क्रांति दिखने में बड़ी क्रांतिकार लगती है,
पर वास्तव में जनता के अधिकारों के जनसहारों की लाशों पर,
श्मशानों में इसकी भी अस्थियाँ बिकती हैं।
लोकतंत्र, लोकतंत्र, चीखते-चीखते गला सूख जाता है,
पर अधिकारों का हिसाब नहीं आता,
आते हैं आँसू गैस के गोले, पेलेट गन्स के छर्रे, कील भरे डंडे,
अठारह टाँके, खून की नदियाँ और पुलिस बर्बरता के नज़ारे,
आते हैं मुद्दे भटकाने के सौ नए तरीके।
सवालों का जवाब चुप्पी और अकड़ में नज़र आता है,
जो भी आंदोलन करे, वो देशद्रोही कहलाता है।
जनतंत्र का हिसाब, जनता की जेबों पर हाथ डालकर दिया जाता है,
बेरोज़गारी का पूछूँ, तो नौजवानों को कॉकरोच कह दिया जाता है,
पर्चे बिकते हैं, बताते हैं, एक ही परिवार के कई लोग इतिहास रचते हैं, चिकित्सक बनते जाते हैं।
यक़ीन नहीं आता, समझ नहीं आता,
और शासक का जवाब तो बिल्कुल भी नहीं आता।
सरकार की समाधि, सरकार से आज़ादी तभी हो जाती है तय,
जब धर्म-कर्म के नाम पर जनतंत्र रो देता है,
तब जंतर-मंतर अपना आपा खो देता है।
बच्चे मरते हैं, आत्महत्या करते हैं,
पर सरकार चुप रहती है, तमाशा देखती है,
कहती है, अभी नौजवान सही से गर्माया नहीं,
कुछ साल और सत्ता की कुर्सी पर टिका जा सकता है।
भ्रष्टाचार होता है, दुराचार तो श्रोता है,
पर सरकार हिसाब नहीं देती,
आँख बंद कर लेती है,
या शायद अंधी ही होती है।
विदेशों की यात्राओं के लंबे फ़रमान आते हैं,
तानाशाह को मस्तीभरी नींद आती है,
पर जवाब नहीं आता।
न्यायालयों के पास वक़्त नहीं,
पुलिस की बर्बरता पर बोलने का।
न्यायालयों को कोई कुछ बोल दे,
तो वो मानहानि की गिनती में ज़रूर आता है।
पर जवाब नहीं आता।
जनता दशियों साल सहती है,
देखती है, कहती है, शांत हो जाती है, और कच्ची नींद सोती है।
जनता की कच्ची नींद का फ़ायदा उठाकर,
नौकरशाह, ख़ुद को समझने लगता है तानाशाह,
खरीदता है पत्रकारों को और करता है खूब अत्याचार।
अच्छे दिन के नारे लगते हैं,
पर अच्छे दिन का कोई हिसाब नहीं आता,
शायद महीने की बत्तीस को आते होंगे,
इसलिए हमें बुरे ही देखने पड़ते हैं।
नौजवानों के भविष्य का अपहरण हो जाता है,
पर शर्म का क़तरा, आँखों में आँसू नहीं आता।
विदेशी दौरे होते हैं,
पर एक पत्रकार सम्मेलन का आयोजन नहीं आता।
इसलिए थक हार कर जनता ख़ुद सड़कों पर आती है,
तो राजा की प्रजा राजा को गणतंत्र की ताकत का स्वाद ख़ुद चखाती है।
सत्याग्रह छिड़ जाते हैं,
राजधानी का सोया हुआ अंतर्मन फिर उठ खड़ा होता है।
"दिल्ली चलो, दिल्ली चलो" के नारों से,
1943 का बोस फिर ज़िंदा होता है,
कब्रों के बीच, क़ुतुब मीनारों से।
दरबार लगते हैं,
एक गांधी-सा तो इस देशभूमि में जन्मा ही होता है।
ये हिंदुस्तान है जनाब,
यहाँ सारी सोनम बेवफ़ा नहीं होती, (सोनम वांगचुक संदर्भ)
यहाँ तो श्री राम भी लोकतंत्र के मंदिर में बैठते हैं,
क्योंकि राम के मंदिरों में तो आजकल खूब भ्रष्टाचार होता है।
भगवान भी यहाँ नास्तिक के घर सोता है।
किसको खरीदोगे?
और अगर खरीदोगे तो आत्मा का क्या भाव होगा?
और अगर आत्मा भी बिक गई?
तो चेतना को किस बाज़ार में बेचोगे?
चेतना को बेचने के बाद,
मरे हुए युवाओं की हड्डियों के ढाँचों का,
चमड़ियों और खून का क्या दाम लोगे?
अगर वो भी बेच दी, तो भी याद रखना—
जब-जब लोकतंत्र की आत्मा नोची जाती है,
तब-तब उसकी चेतना, कब्रों में से उठ खड़ी हो जाती है।
और जब-जब चेतना की हत्या करने की साज़िश रची जाती है,
तब-तब गणतंत्र की अवचेतना, शासक को उसकी औकात दिखाती है।
जब लोकतंत्र, लोकतंत्र चीखते-चीखते गला सूख जाता है,
तब जंतर-मंतर लगते हैं, अत्याचारी सिसकते हैं।
बोस, आज़ाद, गांधी, पटेल अपने वंशजों को आशीर्वाद देकर,
श्मशानों में सोए हुए मुस्कुराते हैं,
इस युग के नौजवान भेज
तानाशाह का आत्म-संस्कार करवाते हैं।
अच्छे दिन के नारे, 2026 में किसको भाते हैं?
जिस देश का प्रधान ही अशिक्षित हो,
वहाँ बस अच्छे दिन के जुमले ही नज़र आते हैं।
LEEZA
Very nice 👍🙂
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