बेईमानी की क्या बात

जनतंत्र के दाह संस्कार में

संविधान रो दिया

भ्रष्टाचार के व्यापार में

बेईमान बड़ा खुश हुआ

जब तक बेईमान के घर आग न लगी थी

तब तक वो बेफिक्र था

और जब उसके घर आग लगी,

तब तक समाज में ईमानदारों का कोई ज़िक्र न था।

ईमानदार चढ़ गए सूली

बेईमानी का जलसा हुआ

जुलूस बनाया गया, मुख़्लिसों का

और बेईमान अफसर हुआ

ईमानदारों का ट्रांसफर हुआ

बेईमानों को मिली तरक्की

तो सब बने बेईमान,

ईमानदारी का फिर कभी सरकारी दफ्तारों में ज़िक्र न हुआ।

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