प्रेम को पैग़म्बर मत बना, साईं।
प्रेम की प्रकृति को जब तुम समझ जाओगे,\
तब सिर्फ़ तुम स्वयं से प्रेम कर पाओगे।
हाँ, यह संसार तुम्हें खिसका हुआ समझेगा,\
कहेगा, बड़ा स्वाभिमान है इसे ख़ुद पर।
पर वो क्या जाने, छोड़ दिए जाने में क्या संतुष्टि है,\
वो क्या जाने, स्वयं के सिवा किसी का न होने में क्या अनुभूति है।
किनारा हो जाने और नदी-सा बहने में ही तो दिव्य दृष्टि है।
अभागे हैं वो सारे, जो नियम को न पहचानें,\
ख़ुद से जान छुड़ाकर, हर अगली त्रासदी में भागें।
नहीं है प्रीति में वो सुख, जो जान लेने में है,\
कि नए युग का अनुराग तो बस साथ रहने में है।
साथ निभाने में नहीं, ठहर जाने में ही,\
पीड़ा को गले लगाने में ही।
तो वक़्त के साथ तुम भी बदल जाओ,\
क्या रखा है दूसरे का हो जाने में?
मोहब्बत करने का हुनर रखते हो,\
तो ख़ुद से करके, ख़ुद को कभी तो अपना महबूब बनाओ।
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