जीवन में और भी बहुत ग़म हैं मौत के सिवा l
जीवन में और भी बहुत ग़म हैं मौत के सिवा
कुछ लोगों को लगता है मौत से बड़ा कोई ग़म नहीं होता,\
पर जब जीते रोज़ मरना पड़ जाए, तो मौत बेहतर लगती है।
कोई मरा, कोई मार दिया गया,
कोई जिया, कोई जीते जी रोज़ मरा।
पर जब सपने मरते हैं, तो उनकी क़ब्र कहाँ सिलती है?
कौन-सी तावीज़ करने से वक़्त वापस आ जाता है?
कौन-सा ज़हर पीने से इंसान का जीना आसान हो जाता है?
मेरा दुख, दुख नहीं है,
क्योंकि मौत से बड़ा कोई दुख नहीं है,
और मौत किसकी हो, इससे भी बहुत फ़र्क़ पड़ता है।
सही कहते हैं,
बाप मर जाता है तो काम करना पड़ जाता है,
माँ मर जाती है तो चूल्हा करना पड़ जाता है।
और भाई मरे तो? बहन मरे तो?
दादी मर जाए तो? दादा मर जाए तो?
दोस्त मर जाए तो? महबूब मर जाए तो?
जीने की इच्छा मर जाए तो? ख़्वाब मर जाए तो?
मौत किसकी हुई, ये जानकर अफ़सोस जताना,\
मौत कैसे हुई, ये जानकर सुनाना-सुनाना।
काश दुख सिर्फ़ दुख होता,\
पीड़ा बस पीड़ा होती,\
दिल सिर्फ़ दिल होता,\
इंसान पत्थर न होता।
हादसे में कोई मरे, तो उसे तमाशा क़रार दे देना,\
बीमारी से कोई मरे, तो उसे वक़्त पर छोड़ देना,\
किसी औरत का पति मरे, तो उसे सती हो जाने देना,\
और किसी आदमी की पत्नी मरे, तो उसका दूसरा ब्याह करवा देना।
माना तेरा दुख मुझसे बड़ा है,\
पर क्या इतनी भी संवेदना नहीं है तुझमें\
कि तू मलाल का भी मुक़ाबला करता है?
माना तू मुझसे कुछ आगे खड़ा है,\
पर क्या इतना बेहिस है तू कि तुझे लगता है,\
दुनिया में तेरे अकेले का ही बाप मरा है?
माना बाप मरना आम बात नहीं है,\
पर तू देख ख़ुद को, तू अच्छा-ख़ासा इंसान,\
किन चीज़ों को लेकर अभी भी खड़ा है?
कोई तकलीफ़ में है तो तू सुन नहीं पाता,\
भागता है तू, ठहर नहीं पाता,\
ठहरने से वसवसे आते हैं,\
रंजिशें तुझे भी हैं,\
सदमे तुझे भी कई लगे, साईं।
तू कोई सुलझा हुआ नहीं है,\
ले ले तू भी ग़म की दवाई।
जो ग़म आसरा है तेरे दिल में,\
उसे पैग़म्बर मत बना।
ये ज़िंदगी की सड़क बड़ी दूर तक जाती है,\
तू आईना तो दे ख़ुद को,\
नदी भी कभी-कभार किनारे के पास ठहर जाती है,\
हवा भी दरख़्त के पत्तों से लिपटकर रो जाती है।
फिर सावन की पहली बारिश आती है,\
तू सदमे को सियाह न कर,\
ग़म को गुमराह न कर।
तकलीफ़ तो तकलीफ़ होती है,\
हमदर्दी की चादर को तू भगवा न कर।
मलाल तो मलाल होता है,\
तसल्ली के आलम का तू इंतख़ाब न कर।
सदमा तो सदमा होता है,\
औलाद का हो या बाप का हो,\
फलसफ़ा तो फलसफ़ा होता है,\
ग़ुर्बत का हो या कामयाब का हो।
भूख ग़रीब को ज़्यादा नहीं लगती,\
ग़म शोहरतमंद को कम नहीं होता।
इंसान जीवन ज़रूर जीता है,\
पर उसका जीवन से भागने का जज़्बा कभी कम नहीं होता।
पर इंसान ये नहीं समझ पाता कि वो चाहे कितना ही तेज़ क्यों न भागे,\
श्मशान घाट के पार, और गंगा मैया से आगे नहीं भाग पाएगा।
मर जाएगा, पर मौत के तसव्वुर से नहीं बच पाएगा,\
इंसानी ग़म के गुम्बदों में एक दिन वो भी क़ैद हो जाएगा।
किसी का बाप बनकर, किसी का भाई बनकर,\
किसी का बेटा बनकर, किसी का पति बनकर,\
हमेशा अपने रिश्तों से ही तो याद किया जाएगा।
उसकी मौत सबकी होगी,\
उसका ग़म सिर्फ़ उसका रह जाएगा।
— Leeza Sharma
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