SHAB E SAWERA
शब-ए-सवेरा
1) क़यामत से नदामत तक,
इंसान से मुर्दे तक,
जज़्बात एक-सा रहता,
अंदाज़ एक-सा रहता है,
इंसान मरने की आस में,
जीवन जीना खो देता है,
और एक दिन यूँ दम निकलता है,
कि ख़ुदा भी रो देता है।
इंसान से मुर्दे तक,
जज़्बात एक-सा रहता,
अंदाज़ एक-सा रहता है,
इंसान मरने की आस में,
जीवन जीना खो देता है,
और एक दिन यूँ दम निकलता है,
कि ख़ुदा भी रो देता है।
2) प्रत्यक्ष को प्रमाण की ज़रूरत नहीं होती,
प्रेम की होती है।
प्रेम की होती है।
3) चीर दो पिंजरे,
चीर दो सितम,
चीर दो इंसानी ग़म,
जो चीर न सको ज़ख़्म,
तो चीर दो ज़िंदगी का इल्म...
4) फ़रमाने-मुक़द्दर को बयान करो,
ज़ंजीरे, जनाज़ों पर गवाह करो,
महबूब, को ना-महरम पर फ़ितना करो,
ख़ुदा, को ख़ैर से गुलिस्तान करो...
5)इश्क़ नहीं मुझे, इख़्तियार है,
इज़ाज़त से,
जो मेरा न हुआ, तो मुझे प्यार है,
अपनी शहादत से।
हर उस मर्ज़ से,
हर उस क़र्ज़ से,
हर उस दरख़्त से,
जो फ़लसफ़ा है, पर फ़रमान नहीं,
जो सजदा है, पर शिकवा नहीं,
जो पाक है, पर पाकीज़ा नहीं,
कहीं मैं कारख़ानों में तो नहीं पली,
क्योंकि मेरे अंदर चिंगारी तो है,
पर जज़्बा नहीं....
इज़ाज़त से,
जो मेरा न हुआ, तो मुझे प्यार है,
अपनी शहादत से।
हर उस मर्ज़ से,
हर उस क़र्ज़ से,
हर उस दरख़्त से,
जो फ़लसफ़ा है, पर फ़रमान नहीं,
जो सजदा है, पर शिकवा नहीं,
जो पाक है, पर पाकीज़ा नहीं,
कहीं मैं कारख़ानों में तो नहीं पली,
क्योंकि मेरे अंदर चिंगारी तो है,
पर जज़्बा नहीं....
लीज़ा
Beautifully intense and layered.
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